प्राकृतिक गोद में बसी तपोभूमि कोटड़ी व्यास में तीन दिवसीय मेला 27 फरवरी से

प्राकृतिक गोद में बसी तपोभूमि कोटड़ी व्यास में तीन दिवसीय मेला 27 फरवरी से

प्राकृतिक गोद में बसी तपोभूमि कोटड़ी व्यास में तीन दिवसीय मेला 27 फरवरी से

देशआदेश/पांवटा साहिब।

 

शिवालिक की पहाड़ियों के अंतिम छोर पर स्थित पर्वत श्रृंखलाओं की सबसे ऊंची चोटी कुंभागढ़ के दक्षिण में लगभग समतल और उपजाऊ भूमि पर बसी ग्राम पंचायत कोटड़ी व्यास (विकास खंड पांवटा साहिब) अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जानी जाती है। यहां स्थित प्राचीन वेदव्यास शिव मंदिर में 27 फरवरी से 1 मार्च तक भव्य मेले का आयोजन किया जाएगा, जिसका समापन विशाल दंगल के साथ होगा।

 

 

महाभारत काल से जुड़ी आस्था
स्थानीय मान्यता के अनुसार इस पवित्र मंदिर की स्थापना महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास द्वारा की गई थी। कहा जाता है कि वे अपनी माता सत्यवती तथा पांडु और धृतराष्ट्र की माता अंबालिका को लेकर इस तपोभूमि में आए और यहां तपस्या की। इस कारण मंदिर का संबंध महाभारत काल से जोड़ा जाता है।

मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन बावड़ी को श्रद्धालु गंगा के समान पवित्र मानते हैं। अमावस्या, मकर संक्रांति और आमला एकादशी पर दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पवित्र स्नान के लिए पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां स्नान और पूजा-अर्चना करने से पापों से मुक्ति मिलती है।

डागा वाला कुआं और वर्षा की मान्यता
मंदिर से लगभग एक किलोमीटर दूर एक प्राचीन कुआं भी स्थित है, जिसे “डागा वाला कुआं” कहा जाता है। यह भी स्थानीय आस्था का केंद्र है।
मंदिर परिसर में तीन समाधियां भी विशेष महत्व रखती हैं। जनश्रुति के अनुसार गुरु के तीन शिष्यों को क्रोधवश समाधि लेने का आदेश मिला था, लेकिन वे अगले दिन हर की पौड़ी, हरिद्वार में अपने गुरु को मिले। आज भी मान्यता है कि यदि वर्षा न हो रही हो तो इन समाधियों पर पवित्र बावड़ी का जल अर्पित करने से वर्षा होती है और गर्मी से राहत मिलती है।

आमला एकादशी पर भव्य दंगल
आमला एकादशी के अवसर पर यहां विशाल मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें प्रमुख आकर्षण दंगल होता है। हिमाचल प्रदेश के अलावा पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश से भी पहलवान अपनी प्रतिभा दिखाने पहुंचते हैं। मेले में क्षेत्रभर से श्रद्धालु और दर्शक जुटते हैं।

शहीद स्मारक और ऐतिहासिक धरोहर
मंदिर परिसर में ग्राम पंचायत व्यास के प्रथम शहीद कमलकांत का शहीद स्मारक भी स्थापित है, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर किए।
मंदिर चारों ओर से घने जंगलों से घिरा है, जहां साल और सैन के वृक्षों के साथ अत्यंत प्राचीन आम के पेड़ भी मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार पूर्व समय में रियासत सिरमौर के राजा अपने काफिले के साथ इसी मार्ग से सिरमौरी ताल की ओर आवाजाही करते थे। हालांकि अब मार्ग जंगलों के कारण जर्जर हो चुका है।

 

 

 

 

पर्यटन मानचित्र पर लाने की मांग

ग्राम पंचायत पूर्व प्रधान सुरेश कुमार के अनुसार वर्ष 2023-24 में इस स्थल को गजट ऑफ इंडिया में प्रकाशित करवाया गया है। इसके बावजूद स्थानीय लोग सरकार और पर्यटन विभाग से इसके जीर्णोद्धार और विकास की अपेक्षा रखते हैं, ताकि यह ऐतिहासिक धरोहर हिमाचल प्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर एक प्रमुख स्थान प्राप्त कर सके।

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